सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश | स्कूलों में छात्राओं को मिला संवैधानिक अधिकार
नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की छात्राओं के हक में एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि स्कूलों में साफ शौचालय और फ्री सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराना केवल सुविधा नहीं, बल्कि हर लड़की का संवैधानिक अधिकार है। इन बुनियादी सुविधाओं का अभाव शिक्षा, गरिमा और समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन माना जाएगा।
⚖️ गरिमा और शिक्षा से जुड़ा मामला
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता की सुविधाएं न होना केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह निजता और गरिमा के अधिकार से भी जुड़ा हुआ है।
कोर्ट ने यह भी माना कि शिक्षा एक “मल्टीप्लायर राइट” है, जो अन्य सभी अधिकारों को मजबूत करता है, इसलिए किसी भी स्थिति में छात्राओं को सुविधाओं के अभाव में पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
🏫 सरकारी और निजी स्कूलों के लिए सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया है कि:
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हर स्कूल में लड़कियों के लिए अलग और साफ शौचालय होना अनिवार्य होगा
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शौचालय में पानी और साबुन की पूरी व्यवस्था की जाए
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सभी स्कूलों में फ्री और बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराए जाएं
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स्कूल परिसरों में MHM (मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन) कॉर्नर बनाया जाए
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जरूरत पड़ने पर छात्राओं को अतिरिक्त यूनिफॉर्म और डिस्पोजेबल बैग उपलब्ध कराए जाएं
अदालत ने साफ किया कि यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि निजी स्कूलों की भी समान रूप से है।
🗣️ मासिक धर्म पर सामाजिक चुप्पी तोड़ने की अपील
फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने समाज में मासिक धर्म को लेकर फैली रूढ़ियों पर भी गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जो लड़कियां मासिक धर्म के कारण खुद को “अशुद्ध” मानकर स्कूल नहीं जातीं, उन्हें यह समझना चाहिए कि इसमें उनकी कोई गलती नहीं है।
कोर्ट ने माता-पिता और शिक्षकों से भी अपील की कि वे इस विषय पर खुलकर बात करें और छात्राओं को मानसिक व सामाजिक समर्थन दें।
📄 जनहित याचिका पर आया फैसला
यह मामला मध्य प्रदेश महिला कांग्रेस की नेता जया ठाकुर द्वारा दायर जनहित याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। याचिका में बताया गया था कि ग्रामीण और कई शहरी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण बड़ी संख्या में छात्राएं स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं।
📌 अब संवैधानिक अधिकार बना मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (MHM) किसी योजना या अनुदान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह हर छात्रा का संवैधानिक अधिकार होगा।
अब राज्यों और स्कूल प्रशासन को इन निर्देशों को जमीन पर लागू करने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने होंगे।